बातें बिजनस की: हम हैं भारत के पढ़े लिखे मूरख नौजवान.(Entrepreneurship development in India)

स्वतंत्रता संघर्ष और आन्दोलनों के समय में हमारा एक प्रमुख नारा था – “अंग्रेजों भारत छोड़ो” ये सफल भी हुआ लेकिन किसे पता था बहुत जल्द ही हम लोग फिर से अंग्रेजों के गुलाम हो जायेंगे.  मैं पश्चिम के देशों द्वारा जबरन एशियाई देशो पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की बात नहीं कह रहा हूँ, मेरा आशय है विकसित राष्ट्रों द्वारा आज के भारत (और कुछ एशियाई देशो) के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों नौजवानों को सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना. विशेषकर अमेरिकी इंटरनेशनल बिजनस करने में माहीर होते हैं, यही कारण भी है कि आज अमेरिका सबसे अमीर और शक्तिशाली देश है. बात चाहे, कुशल डाक्टरों, वैज्ञानिकों, खगोलशास्त्रियों की हो या कम उम्र के आई.टी डेवलपर्स, हार्डवेयर इन्नोवेटर्स की. वे कोई भी मौका चुकते नहीं है अपने यहाँ के प्रतिभाओं को बुलाकर नौकरी देने का. अमेरिकी राजनयिक भी महंगे परमाणु डील अपने फायदे के लिए हमारे डरपोक नेताओं से बीच बीच में कर जाते हैं.

मुझे अक्सर ऐसे इमेल मिलते रहते हैं जिसे कई सारे लोग (ज्यादातर नौजवान) पढ़कर इसे अग्रसारित करते रहते हैं. कुछ युवा जानकारी में रहने के बावजूद भी लकीर के फ़कीर बने हुए हैं. वे बस खुशफहमी में हैं कि कुछ भारतीय स्पेशलिस्ट नाम कमा रहे हैं. मैं ऐसे पढ़े लिखे समझदार युवाओं से पूछना चाहता हूँ, आप क्या कर रहे हैं? आप क्या सब कर सकते हैं, क्यों नहीं आप अपनी क्षमताओं का आकलन करते हैं. आपलोग सिर्फ एस.एम.एस और इमेल फोर्वार्डिंग करने से कैसे खुश हो जाते हैं? एक ऐसे ही इमेल जिसका सब्जेक्ट था “Say proudly, I AM AN INDIAN.” बहुत से वर्किंग प्रोफेशनल्स भी अंधभक्ती करते हुए इमेल फोर्वार्डिंग किये जा रहे थे. मेल में ये दिखाया गया था कि कुछ भारतीय डाक्टर्स, इंजीनियर्स, वैज्ञानिक, डेवलपर्स, एड्वाइजर्स, मैनेजमेंट कंसल्टेंटस, सी.ई.ओ. दुसरे देशों के बड़े कंपनियों में उच्च पद पर आसीन हैं. इसमें खुश होने की कौन सी बात है, मैं तो दुखी हूँ, ये देखकर जब इतने ही टैलेंटेड ये लोग हैं तो दुसरे देशो में अबतक मालिक क्यों नहीं बन गए. क्यों अधेड़ उम्र तक वे नौकरी कर मोटी सैलेरी उठा रहे हैं. क्यों नहीं भारत के स्थापित कंपनियों को विश्व के कोने कोने तक पहुंचा देते.

माफ़ कीजियेगा, यह महान(आज का भ्रष्टतम) देश भारत अपने अन्दर दो देश रखता है एक है अधिसंख्य आबादी वाला गरीब भारत और दुसरा है सीमित आबादी वाला अर्धविकसित अमीर भारत.

हम तकनीक उत्पादन करना तो जानते हैं परन्तु इसका प्रबंधन करना नहीं जानते. हमारे पास उद्दयमशीलता कौशल नहीं है. बहुत समय तक चलने वाले व्यवसाय एवं विपणन कौशल का अभाव है. हमें नहीं पता है अपने स्थानीय उत्पाद (अपने गाँवों में बनने वाले प्रोडक्ट्स) को विश्व भर में कैसे बेचे जाते हैं. हमलोग फौरेन पोलिसिज के प्रशंशक मात्र हैं. हमलोग सिर्फ ये जानते हैं कि अपने देश में बनाए गए उन्नत तकनीक को चंद रुपयों के लालच में हमेशा के लिए अमेरिकी जैसे देशो को कैसे बेचा जाता है. फिर ये खरीदार देश उसी तकनीक/प्रोडक्ट्स को इम्प्रूव कर हम भारतीयों को बेच देते हैं. असल में वे बिजनस करते हैं हम उनसे बिजनस नहीं कर पाते.

ज्यादातर भारतीय युवा केवल ये जानना चाहते हैं “विदेशों में ऊँचे सैलरी पॅकेज पर कैसे नौकरी पाया जाए”. इसके उलट हम नहीं सीखना चाहते हैं कि अपने व्यापक संसाधनों का किस प्रकार उपयोग किया जाए. अपने देश में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन के साथ साथ प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी निवास करते हैं. लेकिन हमें नहीं पता कि इन प्रतिभाओं को कैसे प्रशिक्षित किया जाए, क्योंकी जो प्रशिक्षक है वे तो सिर्फ महंगे करेंसी के लालच में विदेशों में बैठ खुश हैं. ऐसा नहीं कि वे विदेश न जाए जरुर जाएँ, वहां अच्छा काम भी करें मगर जब जब भारत भ्रमण करें तो अपने रिश्तेदारों, दोस्तों से मिलने के साथ साथ यहाँ के जूनियर्स को प्रशिक्षण भी दें, अपना अनुभव बांटे तो कुछ बात बने.

हमारे देश में युवाओं की संख्या में सबसे ज्यादा उछाल है, 2020 तक युवा शक्ती में हम बहुत आगे हो जायेंगे. मगर हम साकारात्मक दिशा में नहीं चल रहे हैं जहाँ से SuperPower India. की अवधारणा पूरी हो सके. लेकिन एक खतरा जरुर दीखता है वो है बेरोजगारों की संख्या वृद्धि. अतः मैं सभी को सलाह देना चाहूँगा, बिजनस करना जरुर सीखें. विशेष कर पढ़े लिखे युवाओं को कहना चाहूँगा नौकरी करे या न करें अंतर्राष्ट्रीय बिजनेस करना जरुर सीखें. यदि भारत को सचमुच अव्वल देखना चाहते हैं तो एंट्रीप्रीनियुअर स्किल्स सीखना होगा, साथ ही अपने से छोटे साथियों को सीखाना भी होगा. नियमित रूप से रणनीतियाँ बनाने होंगे, अन्य देशों में अपनी वैश्विक पहचान बनानी होगी.

इन्टरनेट एक बड़ा हथियार के रूप में हमारे पास है, इसका विवेकपूर्ण समुचित उपयोग कर हम अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आसानी से कर सकते हैं. केवल महानगरों में रह हम यहाँ ट्रेफिक बढायें ये भी आने वाले समय में खतरनाक होगा.

ग्रामीण क्षेत्रों में भी अवसर तलाशने होंगे, वही के युवाओं को चुनकर उन्हें प्रशिक्षण देकर जिला स्तर पर कम्पनियाँ खोले जा सकते हैं. जहाँ तक अंतर्राष्ट्रीय बिजनस करने की बात है, इसमें महानगरों की भीड़ में बैठना जरुरी नहीं है. हाँ सीखने एवं दो-चार साल का अनुभव लेने के लिए महानगरों में नौकरी जरुर करें मगर लक्ष्य सदैव उंचा रहे. मुझे तो भारत का भविष्य सुनहरा दीखता है जरुरत है सिर्फ इस भावना से काम करने की जहां विदेशी कम्पनियां आपके कस्टमर हों न कि आप उनके कंपनी में नौकर.

शुभकामनाओं सहित आपका सहयात्री-

सुलभ

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5 Responses

  1. उम्दा प्रयास सुलभ जी , मेरी शुभकामनाये !

  2. सटीक बात कही है आपने…
    सारी प्रतिभाएं “बाहर” जाकर ही फ़लती-फ़ूलती हैं…

  3. सुलभ जी ,
    बहुत ही सार्थक आलेख है। कभी कभी मुझे तो लगता है , युवा कुछ करना ही नहीं चाहते , बस बैठे-बैठे सब कुछ पा जाना चाहते हैं। बहुत से बेरोजगार साधन संपन्न हैं लेकिन कुछ करना नहीं चाहते।

  4. सुलभ जी आपकी बात से सहमत…..

  5. Very Nice Analysis, Sulabhji.

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