एक चर्चा – शायद सुधार की दिशा तय हो सके Few things to reform our Education system & Health in Poor India.

मुख्य मुद्दे की ओर बढ़ने से पहले मैं आपको अपने बचपन की एक घटना सुनाना चाहूँगा. एक छोटे से शहर का विद्यार्थी जो हमेशा सोचता था राष्ट्र में समग्र प्रगति और मजबूत तंत्र हो. आये दिन कक्षा में होने वाले गतिविधियों जिसमे विषय होता था “हम अपने देश और समाज की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं” (इस तरह के कार्यक्रम प्राय: प्रत्येक स्कूलों में होते होंगे) बालक सुलभ गहराई से सोचता और अपने क्लास की कापी में साफ़ अक्षरों में कुछ लिखता, उन दिनों प्राथमिकता बस यह होती की कक्षा में उच्च अंक प्राप्त किया जाये.

कुछ सालों बाद उसने देखा एक सरकारी लाल बत्ती जिप्सी (Govt. D.S.P. white Jeep) एक बच्चे को स्कूल छोड़ने और छुट्टी के समय वापिस लाने के काम लगभग रोजाना आती जाती थी. यह स्कूल एक साधारण पब्लिक स्कूल था, जिसके नजदीक ही एक सरकारी प्राइमरी स्कूल और थोड़ी दूर पर एक मध्य विद्यालय थे. किशोर सुलभ सोचता यह ठीक नहीं है, यहाँ तो बहुत से गरीब छात्र/छात्राएं दोनों तरह (सरकारी और प्राइवेट) के स्कूलों में पढ़ रहे हैं. धीरे धीरे पब्लिक स्कूल पोपुलर हुआ और कैम्पस का विस्तार हुआ. जबकि प्राइमरी स्कूल और मध्य विद्यालय की स्थिति बीमार स्कूलों की तरह दिखाई देती. आज हम कहीं भी देख ले इन सरकारी विद्यालयों में वैसे छात्र/छात्राओं की संख्या अधिक है जो समाज के निम्न वर्ग परिवार से आते हैं.

आगे सुलभ ने मोहल्ले के कुछ दोस्तों और बड़ो से चर्चाएँ की – “मेरे विचार से महंगे पब्लिक स्कूल केवल बिजनेस मैन परिवार, निजी कर्मचारियों आदि के लिए होने चाहिए, इसमें सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का प्रवेश निषेध होना चाहिए. सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के बच्चों के लिए केवल और केवल सरकारी विद्यालय ही होने चाहिए, उन्हें वे सारी सुविधाए मिलनी चाहिए जैसा की सरकार मुफ्त आवास, मेडिकल आदि देती है” कुछ ऐसी व्यवस्था है भी – केंद्रीय विद्यालय संगठन (Central Schools in India) एक अच्छा उदाहरण है.

मुझे लगता है आमूल चूल परिवर्तन के लिए कुछ विशेष नियमों की जरुरत है. मै सभी से पूछना चाहता हूँ – क्या इस तरह के किसी नियम की जरुरत है देश को ?? अगर इस किस्म का कोई क़ानून होता है तो मुझे लगता है, सरकारी विद्यालयों, अस्पतालों के तंत्र खुद बा खुद सही हो जायेंगे. एक प्राइमरी और मध्य विद्यालयों में जब कनिष्ठ और वरिष्ठ सभी सरकारी कर्मियों के बच्चे जब साथ साथ पढेंगे तब स्कूल की हालत दयनीय नहीं रहेगी. आम जनता का विश्वाश सरकारी स्कूलों में फिर से जमेगा. अपने देश में बहुत से सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों की स्थिति चिंताजनक है – बगैर टीचर, बगैर डाक्टर, बगैर भवन और अन्य जरुरी उपस्कर के बिना ये चल रहे हैं, जबकि सचाई यह है की सरकार के पास अच्छा बज़ट है हमारे सिस्टम के प्रतिष्ठानों को चलाने के लिए.

कारण सिर्फ एक ही है – आज कोई भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी चाहे वो चतुर्थ श्रेणी के हों या प्रथम श्रेणी गजटेड ऑफिसर, कोई भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल नहीं भेजना चाहता और न ही कोई किसी सहायता के लिए सरकारी अस्पताल का रुख करता है.