हमारा संविधान ही हमारा धर्मग्रन्थ है.

ड़ी अजीब स्थिति है की एक साधारण सी बात को समझने समझाने में बड़े बड़े तर्कों का सहारा लेना पड़ रहा है. मोटे तौर पर किसी भी सम्प्रदाय में धर्म ग्रन्थ का दो ही उद्देश्य है. कोई अकेला व्यक्ति किस प्रकार अपने आप को ईश्वर का साक्षी मान इस संसार में अपने होने का प्रयोजन समझे. दूसरा, सामूहिक जीवन में उसकी जिम्मेदारियां और सीमाएं क्या हैं.
प्रथम बिंदु स्व-चिंतन, प्रवचन और अनुभव पर आधारित है. वो किसलिए मनुष्य रूप में है? उसके पास क्यों विवेक है? उसके पास क्यों करुणा/संवेदना है? प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहली शिक्षा अपने इन्द्रियों के अधीन रहकर ही सीखता है. इन्द्रियाँ ही किसी को सभ्य बनाने का काम करती हैं. कोई भी व्यक्ति वो चाहे जाहिल हो या विद्वान्, तेज धूप में छाँव की चाह रखेगा और प्यास लगने पर पानी की. मतलब शरीर और मन को सुख देने की प्रक्रिया उसके अपने भीतर से जन्मती है. मनुष्य के लिए विवेक वो शस्त्र साबित हुआ जो उसे अपनी इन्द्रियों की अनावश्यक गुलामी से निकालकर, जानवर से आदमी बनाने की राह पर अग्रसर है.

दूसरा है सामूहिक जीवन, यही हमारे लिए महत्वपूर्ण है यही चर्चा का विषय भी है. चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वो कहीं भी हो वह समूह में रहेगा. परिवार में रहना एक समूह है और यह परिवार जहाँ  पल्लवित है वो समाज है समाज भी एक समूह है. कोई भी समूह बगैर नियम कायदे(क़ानून) के एक कदम भी सही दिशा में चल नहीं सकता. पूर्व में बहुत सारे समाज अपने क्षेत्र विशेष(प्रकृति) से प्राप्त सुविधाओं और वैज्ञानिक खोज से अपने स्वरुप को निखारता गया.  इसे सभ्यता कहना ज्यादा सही होगा.  सभ्यता मतलब एक सामान वेश भूषा, खान-पान, जीवन शैली, लोकाचार और सुरक्षा व्यवस्था अपना कर जीवन यापन करने वाले मानव समुदाय. अक्सर दुसरे क्षेत्र के ऐसे ही समुदाय जिनकी सभ्यता अलग दिखती रही हो, एक दुसरे को अपना दुश्मन मान बैठते आये हैं. यहाँ भी मनुष्य का विवेक ही काम आया की दो विभिन्न समुदाय आपस में जब हिंसा, हमले कर रहे हों तब विचारों के आदान प्रदान से इशारों/ कौमन भाषा/तरीके से समस्याओं का समाधान करते आए हैं. जब कभी भी असामाजिक तत्व(समूह के नियमों को न मानने वाले, अपनी मनमानी करने वाले) सक्रिय हुए, उन्हें रास्ते पर लाने के लिए सजा या धार्मिक उपदेश(पूर्व के मौखिक/लिखित सामग्री) का सहारा लिया गया. विभिन्न क्षेत्र, कबीलाओं एवं राज्यों में इसे संवैधानिक माना गया. धर्म ग्रंथों के प्रति आम लोगों की आस्था बढती चली गयी.

मतलब तमाम आपसी टकराव की संभावनाओं के साथ साथ समूह की महत्ता, शक्ति, उपयोगिता समझते हुए प्रकृति की दुरुहता (रास्ते, जंगल, नदियाँ इत्यादि) और अपने से विशाल जानवरों को अपने अधीन करने निकल पड़े. कालांतर में अपने क्षेत्र (जंगलों, खेतों, समन्दरों) की सीमाएं तय हुई. समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए, मानव मात्र की भलाई के लिए, राजा-प्रजा क़ानून व्यवस्था की पद्धति कायम (और विकसित) होती गयी. साथ ही विकास के विभिन्न आयामों की परख तेज हुई, जिसमे परंपरा, संस्कृति, विरासती मूल्य की चीज़ें, कला कौशल, शिक्षा, सामाजिक धार्मिक चिंतन, वैज्ञानिक खोजें, शोध एवं प्रयोगशालाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और इसे सुरक्षित पोषण और अपना नाम देने के लिए नक़्शे सीमा रेखा का अनुसरण किया गया. बाहरी आक्रमण से बचाव के लिए सेनाओं का गठन हुआ, फलतः राष्ट्र की रुपरेखा तय हुई. नाना प्रकार के राष्ट्रीय चिन्ह अस्तित्व में आए. व्यक्ति और उसके राष्ट्र के बीच भावनात्मक सम्बन्ध का प्रवाह हुआ. यही राष्ट्रीयता है. अपने क्षेत्र विशेष को सुन्दर, स्वच्छ, ज्ञानवर्धक, उपयोगी बनाने की होड़ चल पड़ी. साथ ही अपने पीड़ित, तटस्थ, अभावग्रस्त मानव समुदाय और क्षेत्र को स्वस्थ, शक्ति-साधन संपन्न बनाने के लिए नाना प्रकार के योजनायें बनायी गयी. ऐसे कार्यों में शासन ने विज्ञ जनों का निरंतर सहयोग लिया. संविधान का निर्माण हुआ. चरित्र निर्माण की जो बातें हमारे संविधान में उल्लेखित नहीं है वो हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा के अंतर्गत अनिवार्य विषय है. अपने संविधान की जानकारी रखना और नैतिक मूल्यों का पालन करना हर नागरिक का प्रथम कर्त्तव्य है, इसके बाद ही परिवार और व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति का स्थान है. प्रगतिशील समाज में संविधान ही हमारा धर्म ग्रन्थ है. इसके विपरीत चलना या इतर कुछ और मानना या किसी अन्य राष्ट्र के संविधान का अनुसरण करना समूह(राष्ट्र) की प्रगति को बाधा पहुंचाना है. ऐसा करना राष्ट्रद्रोह  की श्रेणी में आएगा. इसके लिए दंड का प्रावधान हैं. यदि किसी व्यक्ति विशेष को लगता है की उसके राष्ट्र के संविधान में कुछ खामी है या किसी का अहित हो रहा है तो इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके हैं. किसी भी नियम कायदे में रद्दो-बदल (निरस्त या फेर बदल) करने की समुचित व्यवस्था भी है.