A few about Gregorian Calendar. Hindi vs English Months

Before Welcome New Year let’s have a look on Interesting History.

Everywhere in this world there are huge celebrations in the name of New Year Welcome. In Indian Government gazette the 1st January is not a holiday but peoples are celebrating. It’s good to see that we people are optimistic and we must see hope in coming years. Celebrating in mid night is different from other religious or national perspective. Actually, we just want to welcome with full of enthusiasm.

But my point is – Why 12 PM is the moment of blast. It’s a just technical aspect that dates are changing after 12’o clock in the night. According to the Gregorian calendar after 31st mid night First January comes.  Practically our days start with the first light of Sun in the morning after the night yesterday we had.

Ancient, Sanatan Indian Calendar follows the practical Dharma: of the human/citizens of this planet i.e. Earth.

Early morning 4-5 O’clock – The Brahma Muhurt is the perfect and should be ideal for all. At least for Indians first light of the day is the divine. When we receive the light in the early morning it treats like a great source of energy with positive direction for the whole day in which we enter.

History at a glance – In the world before the European Kingdom ruled. There were total 10 months in a Year. But In India (Bharat Varsha) There was total 12 start from Chait Maas to Falgun Maas and still remains twelve. Ours based on facts, totally scientific and based on planetary motions and seasons.

Following table shows the true picture of Gregorian Calendar Month and their Interesting Story. We say it Interesting because of crazy(sanki) Kings from Rome.

First Calendar was formed by Roman King “Romulus” with 10 months. No January and February.

 

Western Months 1Marilus 2Aprilus 3Meyia

 

4Juno 5Vivtilus

 

6Savistalis 7Septane (Seven) 8Octovar (Eight) 9Novaz (Nine) 10Dasam (Ten) Based on the name of Goddess
Total 10 Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec
Indian Months 1Chait 2Baisaakh 3Jyesth 4Asadh 5Shrawan 6Bhadra 7Ashwin 8Kartik 9Agrahany 10Pushy 11Maagh 12Falgun
Total 12 Mar-Apr Apr-May May-Jun Jun-Jul Jul-Aug Aug-Sep Sep-Oct Oct-Nov Nov-Dec Dec-Jan Jan-Feb Feb-Mar

After King Pompulus: Jan/Feb added as 11th and 12th Month. Feb with remaining 29 Days.

Corrected Western Months(12) 1Marilus 2 3 4 5Vivtilus 6 7 8 10Dasam 11Janus 12Faibu

The month of self-realization

Name Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec Jan Feb

King Julius Seizure, whose month of birth is “Vivtilus” as 7th (earlier 5th). He received the owner of kingdom in the month of 11th i.e January. He ordered January should be first. So Jan became the first.  Further the month name Vivtilus renamed to July by sourcing his name.

After King Julius Seizure, Octavian became the king. For his good work he honoured by “Eperator and Augustus” Samman. Meaning “Sacred”.  So this way…

Period Counting
Western Months 1Janus

 

2Faibu 3 4 5 6 7
(July)
8 9Septane 10Octate 11Novaz 12Dasam
(Total 12) Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec
Indian Months 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
(Total 12) 11-Maagh 12-Falgun 1-Chait 2-Baisaakh 3-Jyesth 4-Asadh 5-Srawan 6-Bhadr 7-Ashwin 8-Kartik 9-Agrahany 10-Pushy

Earlier in August there was 30 days. But just for the sake of pride of the king Augustus Seizure. One day cut from February and added to the August. Now you can easily understand how baseless and non-scientific facts added to the Gregorian calendar. During British-India period, Gregorian calendar standard applied. Say proudly, we Indians are not blind follower of western society.

Note: Just for awareness purpose, this Article is compiled by Sulabh Jaiswal, some facts taken from the researchers (Mr. Narendra Sangal, Dr. Kirtivardhan Agrawal).

~~~ दीप जले, तमस तले, प्रकाश का आगमन हो;  खुशियाँ हो, शुभ सन्देश मिले, नूतन वर्ष सनातन हो ~~~

(Deep Jale, Tamas tale, Prakash Ka Aagman ho; Khushiyan ho, Shubh Sandesh mile, Nutan Varsh Sanatan ho.)

 Aap Sabhi Saathiyon ko Angrezi Nav-Varsh ki Shubhkamnayen.

Happy New Year “2013”

बातें बिजनस की: हम हैं भारत के पढ़े लिखे मूरख नौजवान.(Entrepreneurship development in India)

स्वतंत्रता संघर्ष और आन्दोलनों के समय में हमारा एक प्रमुख नारा था – “अंग्रेजों भारत छोड़ो” ये सफल भी हुआ लेकिन किसे पता था बहुत जल्द ही हम लोग फिर से अंग्रेजों के गुलाम हो जायेंगे.  मैं पश्चिम के देशों द्वारा जबरन एशियाई देशो पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की बात नहीं कह रहा हूँ, मेरा आशय है विकसित राष्ट्रों द्वारा आज के भारत (और कुछ एशियाई देशो) के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों नौजवानों को सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना. विशेषकर अमेरिकी इंटरनेशनल बिजनस करने में माहीर होते हैं, यही कारण भी है कि आज अमेरिका सबसे अमीर और शक्तिशाली देश है. बात चाहे, कुशल डाक्टरों, वैज्ञानिकों, खगोलशास्त्रियों की हो या कम उम्र के आई.टी डेवलपर्स, हार्डवेयर इन्नोवेटर्स की. वे कोई भी मौका चुकते नहीं है अपने यहाँ के प्रतिभाओं को बुलाकर नौकरी देने का. अमेरिकी राजनयिक भी महंगे परमाणु डील अपने फायदे के लिए हमारे डरपोक नेताओं से बीच बीच में कर जाते हैं.

मुझे अक्सर ऐसे इमेल मिलते रहते हैं जिसे कई सारे लोग (ज्यादातर नौजवान) पढ़कर इसे अग्रसारित करते रहते हैं. कुछ युवा जानकारी में रहने के बावजूद भी लकीर के फ़कीर बने हुए हैं. वे बस खुशफहमी में हैं कि कुछ भारतीय स्पेशलिस्ट नाम कमा रहे हैं. मैं ऐसे पढ़े लिखे समझदार युवाओं से पूछना चाहता हूँ, आप क्या कर रहे हैं? आप क्या सब कर सकते हैं, क्यों नहीं आप अपनी क्षमताओं का आकलन करते हैं. आपलोग सिर्फ एस.एम.एस और इमेल फोर्वार्डिंग करने से कैसे खुश हो जाते हैं? एक ऐसे ही इमेल जिसका सब्जेक्ट था “Say proudly, I AM AN INDIAN.” बहुत से वर्किंग प्रोफेशनल्स भी अंधभक्ती करते हुए इमेल फोर्वार्डिंग किये जा रहे थे. मेल में ये दिखाया गया था कि कुछ भारतीय डाक्टर्स, इंजीनियर्स, वैज्ञानिक, डेवलपर्स, एड्वाइजर्स, मैनेजमेंट कंसल्टेंटस, सी.ई.ओ. दुसरे देशों के बड़े कंपनियों में उच्च पद पर आसीन हैं. इसमें खुश होने की कौन सी बात है, मैं तो दुखी हूँ, ये देखकर जब इतने ही टैलेंटेड ये लोग हैं तो दुसरे देशो में अबतक मालिक क्यों नहीं बन गए. क्यों अधेड़ उम्र तक वे नौकरी कर मोटी सैलेरी उठा रहे हैं. क्यों नहीं भारत के स्थापित कंपनियों को विश्व के कोने कोने तक पहुंचा देते.

माफ़ कीजियेगा, यह महान(आज का भ्रष्टतम) देश भारत अपने अन्दर दो देश रखता है एक है अधिसंख्य आबादी वाला गरीब भारत और दुसरा है सीमित आबादी वाला अर्धविकसित अमीर भारत.

हम तकनीक उत्पादन करना तो जानते हैं परन्तु इसका प्रबंधन करना नहीं जानते. हमारे पास उद्दयमशीलता कौशल नहीं है. बहुत समय तक चलने वाले व्यवसाय एवं विपणन कौशल का अभाव है. हमें नहीं पता है अपने स्थानीय उत्पाद (अपने गाँवों में बनने वाले प्रोडक्ट्स) को विश्व भर में कैसे बेचे जाते हैं. हमलोग फौरेन पोलिसिज के प्रशंशक मात्र हैं. हमलोग सिर्फ ये जानते हैं कि अपने देश में बनाए गए उन्नत तकनीक को चंद रुपयों के लालच में हमेशा के लिए अमेरिकी जैसे देशो को कैसे बेचा जाता है. फिर ये खरीदार देश उसी तकनीक/प्रोडक्ट्स को इम्प्रूव कर हम भारतीयों को बेच देते हैं. असल में वे बिजनस करते हैं हम उनसे बिजनस नहीं कर पाते.

ज्यादातर भारतीय युवा केवल ये जानना चाहते हैं “विदेशों में ऊँचे सैलरी पॅकेज पर कैसे नौकरी पाया जाए”. इसके उलट हम नहीं सीखना चाहते हैं कि अपने व्यापक संसाधनों का किस प्रकार उपयोग किया जाए. अपने देश में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन के साथ साथ प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी निवास करते हैं. लेकिन हमें नहीं पता कि इन प्रतिभाओं को कैसे प्रशिक्षित किया जाए, क्योंकी जो प्रशिक्षक है वे तो सिर्फ महंगे करेंसी के लालच में विदेशों में बैठ खुश हैं. ऐसा नहीं कि वे विदेश न जाए जरुर जाएँ, वहां अच्छा काम भी करें मगर जब जब भारत भ्रमण करें तो अपने रिश्तेदारों, दोस्तों से मिलने के साथ साथ यहाँ के जूनियर्स को प्रशिक्षण भी दें, अपना अनुभव बांटे तो कुछ बात बने.

हमारे देश में युवाओं की संख्या में सबसे ज्यादा उछाल है, 2020 तक युवा शक्ती में हम बहुत आगे हो जायेंगे. मगर हम साकारात्मक दिशा में नहीं चल रहे हैं जहाँ से SuperPower India. की अवधारणा पूरी हो सके. लेकिन एक खतरा जरुर दीखता है वो है बेरोजगारों की संख्या वृद्धि. अतः मैं सभी को सलाह देना चाहूँगा, बिजनस करना जरुर सीखें. विशेष कर पढ़े लिखे युवाओं को कहना चाहूँगा नौकरी करे या न करें अंतर्राष्ट्रीय बिजनेस करना जरुर सीखें. यदि भारत को सचमुच अव्वल देखना चाहते हैं तो एंट्रीप्रीनियुअर स्किल्स सीखना होगा, साथ ही अपने से छोटे साथियों को सीखाना भी होगा. नियमित रूप से रणनीतियाँ बनाने होंगे, अन्य देशों में अपनी वैश्विक पहचान बनानी होगी.

इन्टरनेट एक बड़ा हथियार के रूप में हमारे पास है, इसका विवेकपूर्ण समुचित उपयोग कर हम अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आसानी से कर सकते हैं. केवल महानगरों में रह हम यहाँ ट्रेफिक बढायें ये भी आने वाले समय में खतरनाक होगा.

ग्रामीण क्षेत्रों में भी अवसर तलाशने होंगे, वही के युवाओं को चुनकर उन्हें प्रशिक्षण देकर जिला स्तर पर कम्पनियाँ खोले जा सकते हैं. जहाँ तक अंतर्राष्ट्रीय बिजनस करने की बात है, इसमें महानगरों की भीड़ में बैठना जरुरी नहीं है. हाँ सीखने एवं दो-चार साल का अनुभव लेने के लिए महानगरों में नौकरी जरुर करें मगर लक्ष्य सदैव उंचा रहे. मुझे तो भारत का भविष्य सुनहरा दीखता है जरुरत है सिर्फ इस भावना से काम करने की जहां विदेशी कम्पनियां आपके कस्टमर हों न कि आप उनके कंपनी में नौकर.

शुभकामनाओं सहित आपका सहयात्री-

सुलभ

एक चर्चा – शायद सुधार की दिशा तय हो सके Few things to reform our Education system & Health in Poor India.

मुख्य मुद्दे की ओर बढ़ने से पहले मैं आपको अपने बचपन की एक घटना सुनाना चाहूँगा. एक छोटे से शहर का विद्यार्थी जो हमेशा सोचता था राष्ट्र में समग्र प्रगति और मजबूत तंत्र हो. आये दिन कक्षा में होने वाले गतिविधियों जिसमे विषय होता था “हम अपने देश और समाज की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं” (इस तरह के कार्यक्रम प्राय: प्रत्येक स्कूलों में होते होंगे) बालक सुलभ गहराई से सोचता और अपने क्लास की कापी में साफ़ अक्षरों में कुछ लिखता, उन दिनों प्राथमिकता बस यह होती की कक्षा में उच्च अंक प्राप्त किया जाये.

कुछ सालों बाद उसने देखा एक सरकारी लाल बत्ती जिप्सी (Govt. D.S.P. white Jeep) एक बच्चे को स्कूल छोड़ने और छुट्टी के समय वापिस लाने के काम लगभग रोजाना आती जाती थी. यह स्कूल एक साधारण पब्लिक स्कूल था, जिसके नजदीक ही एक सरकारी प्राइमरी स्कूल और थोड़ी दूर पर एक मध्य विद्यालय थे. किशोर सुलभ सोचता यह ठीक नहीं है, यहाँ तो बहुत से गरीब छात्र/छात्राएं दोनों तरह (सरकारी और प्राइवेट) के स्कूलों में पढ़ रहे हैं. धीरे धीरे पब्लिक स्कूल पोपुलर हुआ और कैम्पस का विस्तार हुआ. जबकि प्राइमरी स्कूल और मध्य विद्यालय की स्थिति बीमार स्कूलों की तरह दिखाई देती. आज हम कहीं भी देख ले इन सरकारी विद्यालयों में वैसे छात्र/छात्राओं की संख्या अधिक है जो समाज के निम्न वर्ग परिवार से आते हैं.

आगे सुलभ ने मोहल्ले के कुछ दोस्तों और बड़ो से चर्चाएँ की – “मेरे विचार से महंगे पब्लिक स्कूल केवल बिजनेस मैन परिवार, निजी कर्मचारियों आदि के लिए होने चाहिए, इसमें सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का प्रवेश निषेध होना चाहिए. सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के बच्चों के लिए केवल और केवल सरकारी विद्यालय ही होने चाहिए, उन्हें वे सारी सुविधाए मिलनी चाहिए जैसा की सरकार मुफ्त आवास, मेडिकल आदि देती है” कुछ ऐसी व्यवस्था है भी – केंद्रीय विद्यालय संगठन (Central Schools in India) एक अच्छा उदाहरण है.

मुझे लगता है आमूल चूल परिवर्तन के लिए कुछ विशेष नियमों की जरुरत है. मै सभी से पूछना चाहता हूँ – क्या इस तरह के किसी नियम की जरुरत है देश को ?? अगर इस किस्म का कोई क़ानून होता है तो मुझे लगता है, सरकारी विद्यालयों, अस्पतालों के तंत्र खुद बा खुद सही हो जायेंगे. एक प्राइमरी और मध्य विद्यालयों में जब कनिष्ठ और वरिष्ठ सभी सरकारी कर्मियों के बच्चे जब साथ साथ पढेंगे तब स्कूल की हालत दयनीय नहीं रहेगी. आम जनता का विश्वाश सरकारी स्कूलों में फिर से जमेगा. अपने देश में बहुत से सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों की स्थिति चिंताजनक है – बगैर टीचर, बगैर डाक्टर, बगैर भवन और अन्य जरुरी उपस्कर के बिना ये चल रहे हैं, जबकि सचाई यह है की सरकार के पास अच्छा बज़ट है हमारे सिस्टम के प्रतिष्ठानों को चलाने के लिए.

कारण सिर्फ एक ही है – आज कोई भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी चाहे वो चतुर्थ श्रेणी के हों या प्रथम श्रेणी गजटेड ऑफिसर, कोई भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल नहीं भेजना चाहता और न ही कोई किसी सहायता के लिए सरकारी अस्पताल का रुख करता है.

हमारा संविधान ही हमारा धर्मग्रन्थ है.

ड़ी अजीब स्थिति है की एक साधारण सी बात को समझने समझाने में बड़े बड़े तर्कों का सहारा लेना पड़ रहा है. मोटे तौर पर किसी भी सम्प्रदाय में धर्म ग्रन्थ का दो ही उद्देश्य है. कोई अकेला व्यक्ति किस प्रकार अपने आप को ईश्वर का साक्षी मान इस संसार में अपने होने का प्रयोजन समझे. दूसरा, सामूहिक जीवन में उसकी जिम्मेदारियां और सीमाएं क्या हैं.
प्रथम बिंदु स्व-चिंतन, प्रवचन और अनुभव पर आधारित है. वो किसलिए मनुष्य रूप में है? उसके पास क्यों विवेक है? उसके पास क्यों करुणा/संवेदना है? प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहली शिक्षा अपने इन्द्रियों के अधीन रहकर ही सीखता है. इन्द्रियाँ ही किसी को सभ्य बनाने का काम करती हैं. कोई भी व्यक्ति वो चाहे जाहिल हो या विद्वान्, तेज धूप में छाँव की चाह रखेगा और प्यास लगने पर पानी की. मतलब शरीर और मन को सुख देने की प्रक्रिया उसके अपने भीतर से जन्मती है. मनुष्य के लिए विवेक वो शस्त्र साबित हुआ जो उसे अपनी इन्द्रियों की अनावश्यक गुलामी से निकालकर, जानवर से आदमी बनाने की राह पर अग्रसर है.

दूसरा है सामूहिक जीवन, यही हमारे लिए महत्वपूर्ण है यही चर्चा का विषय भी है. चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वो कहीं भी हो वह समूह में रहेगा. परिवार में रहना एक समूह है और यह परिवार जहाँ  पल्लवित है वो समाज है समाज भी एक समूह है. कोई भी समूह बगैर नियम कायदे(क़ानून) के एक कदम भी सही दिशा में चल नहीं सकता. पूर्व में बहुत सारे समाज अपने क्षेत्र विशेष(प्रकृति) से प्राप्त सुविधाओं और वैज्ञानिक खोज से अपने स्वरुप को निखारता गया.  इसे सभ्यता कहना ज्यादा सही होगा.  सभ्यता मतलब एक सामान वेश भूषा, खान-पान, जीवन शैली, लोकाचार और सुरक्षा व्यवस्था अपना कर जीवन यापन करने वाले मानव समुदाय. अक्सर दुसरे क्षेत्र के ऐसे ही समुदाय जिनकी सभ्यता अलग दिखती रही हो, एक दुसरे को अपना दुश्मन मान बैठते आये हैं. यहाँ भी मनुष्य का विवेक ही काम आया की दो विभिन्न समुदाय आपस में जब हिंसा, हमले कर रहे हों तब विचारों के आदान प्रदान से इशारों/ कौमन भाषा/तरीके से समस्याओं का समाधान करते आए हैं. जब कभी भी असामाजिक तत्व(समूह के नियमों को न मानने वाले, अपनी मनमानी करने वाले) सक्रिय हुए, उन्हें रास्ते पर लाने के लिए सजा या धार्मिक उपदेश(पूर्व के मौखिक/लिखित सामग्री) का सहारा लिया गया. विभिन्न क्षेत्र, कबीलाओं एवं राज्यों में इसे संवैधानिक माना गया. धर्म ग्रंथों के प्रति आम लोगों की आस्था बढती चली गयी.

मतलब तमाम आपसी टकराव की संभावनाओं के साथ साथ समूह की महत्ता, शक्ति, उपयोगिता समझते हुए प्रकृति की दुरुहता (रास्ते, जंगल, नदियाँ इत्यादि) और अपने से विशाल जानवरों को अपने अधीन करने निकल पड़े. कालांतर में अपने क्षेत्र (जंगलों, खेतों, समन्दरों) की सीमाएं तय हुई. समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए, मानव मात्र की भलाई के लिए, राजा-प्रजा क़ानून व्यवस्था की पद्धति कायम (और विकसित) होती गयी. साथ ही विकास के विभिन्न आयामों की परख तेज हुई, जिसमे परंपरा, संस्कृति, विरासती मूल्य की चीज़ें, कला कौशल, शिक्षा, सामाजिक धार्मिक चिंतन, वैज्ञानिक खोजें, शोध एवं प्रयोगशालाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और इसे सुरक्षित पोषण और अपना नाम देने के लिए नक़्शे सीमा रेखा का अनुसरण किया गया. बाहरी आक्रमण से बचाव के लिए सेनाओं का गठन हुआ, फलतः राष्ट्र की रुपरेखा तय हुई. नाना प्रकार के राष्ट्रीय चिन्ह अस्तित्व में आए. व्यक्ति और उसके राष्ट्र के बीच भावनात्मक सम्बन्ध का प्रवाह हुआ. यही राष्ट्रीयता है. अपने क्षेत्र विशेष को सुन्दर, स्वच्छ, ज्ञानवर्धक, उपयोगी बनाने की होड़ चल पड़ी. साथ ही अपने पीड़ित, तटस्थ, अभावग्रस्त मानव समुदाय और क्षेत्र को स्वस्थ, शक्ति-साधन संपन्न बनाने के लिए नाना प्रकार के योजनायें बनायी गयी. ऐसे कार्यों में शासन ने विज्ञ जनों का निरंतर सहयोग लिया. संविधान का निर्माण हुआ. चरित्र निर्माण की जो बातें हमारे संविधान में उल्लेखित नहीं है वो हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा के अंतर्गत अनिवार्य विषय है. अपने संविधान की जानकारी रखना और नैतिक मूल्यों का पालन करना हर नागरिक का प्रथम कर्त्तव्य है, इसके बाद ही परिवार और व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति का स्थान है. प्रगतिशील समाज में संविधान ही हमारा धर्म ग्रन्थ है. इसके विपरीत चलना या इतर कुछ और मानना या किसी अन्य राष्ट्र के संविधान का अनुसरण करना समूह(राष्ट्र) की प्रगति को बाधा पहुंचाना है. ऐसा करना राष्ट्रद्रोह  की श्रेणी में आएगा. इसके लिए दंड का प्रावधान हैं. यदि किसी व्यक्ति विशेष को लगता है की उसके राष्ट्र के संविधान में कुछ खामी है या किसी का अहित हो रहा है तो इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके हैं. किसी भी नियम कायदे में रद्दो-बदल (निरस्त या फेर बदल) करने की समुचित व्यवस्था भी है.

सभी कचड़ा ब्लोगर साथियों, टिप्पणीकर्ताओं को आगाह किया जाता है

आजकल धार्मिक कट्टरता सम्बंधित ब्लॉग पोस्ट और धार्मिक ज्ञान बखान कुछ ज्यादा ही हो रहा ही. सभी कचड़ा ब्लोगर साथियों, टिप्पणीकर्ताओं को आगाह किया जाता है की वे इस धर्म-निरपेक्ष देश में कायदे में रह कर ब्लोगरी करें. मैं कभी भी घटिया लेखकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता हूँ.

ऐसे मुद्दों पर पहले भी कहा हूँ, आज फिर दोहरा रहा हूँ. “दुनिया में हरेक व्यक्ति को सबकी आस्था का सम्मान करना सीखना पड़ेगा. कोई चाहे आस्तिक हो नास्तिक हो इस्लामिक हो या गैर इस्लामिक हो. सभी नागरिक होते हैं और सबमे प्रतिभा और पोटेंशिअल होता है.”

मेरे विचार में, मैं भी अच्छा धार्मिक बखान कर सकता हूँ – एक नमूना पढ़ लीजिये…

मैं(“सिर्फ मानवीय मूल्यों में आस्था रखने वाला”) ही इश्वर हूँ और प्रत्येक बुद्धिप्राप्त प्राणी इश्वर है. इस सृष्टि में दो ही चीज़ है… जान और बेजान (Living thing & Non-living thing) मनुष्य पिछले हज़ारो/अनगिनत सदियों से अपनी बुद्धि और चेतना का निरंतर प्रयोग करते हुए आज सूचना युग में विचरण कर रहा है. मैं चाहूँ तो वैदिक काल के ऋषि या इसा पूर्व महात्मा बुद्ध या इशु या मोहम्मद या जैनगुरु महावीर की तरह किसी नए धर्म/पंथ का ईजाद कर सकता हूँ और फुर्सत की उम्र रही तो महाकाव्य(पवित्र किताब धर्मग्रंथ holi-book ) भी रच सकता हूँ और भक्तों/अंध-भक्तों (अनुयायियों) की फ़ौज मिले तो दुनिया भर में ईश्वरीय सत्ता को नए तरीके से स्थापित कर सकता हूँ.

लेकिन ऐसा कर के क्या होगा क्या पृथ्वी पर मानव समुदाय का सचमुच कल्याण हो जायेगा. शायद नहीं! होगा सिर्फ इतना की आने वाले शताब्दियों में एक और युग-पुरुष/धर्मगुरु/पैगम्बर इत्यादि के रूप में सुलभ और उसके द्वारा बनाए गए इश्वर (I-S-H-W-A-R या G-O-D या A-L-L-A-H या #-#-#) को धर्म-निरपेक्ष समाज/राज में एक पंथ/धर्म के रूप में मान्यता मिल जायेगी (क्यूंकि तबतक दुनिया के कुछ प्रतिशत आबादी इसके अनुयायी रहेंगे और मानवीयता का तकाजा है सर्व:धर्म:समभाव सबकी आस्था का सम्मान होगा). लेकिन क्या मानव समुदाय सच्चा मानव बन पायेगा. शायद नहीं. स्थिति आज की तरह या इससे भी त्रासद होगी… तभी तो एक सच्चा मानव (धार्मिक/नास्तिक/आस्तिक मानव) ऐसा दुःख देखकर इस पृथ्वी से अल्पायु में ही विदा हो गया जिनको हम “स्वामी विवेकानंद” नाम से जानते हैं.

हर विवेकशील प्राणी का दिल ही जानता है की वो क्यूँ ऐसा स्वयं पर विश्वास करता है या क्यूँ ऐसा तर्क औरों को देता है. मेरा मानना है, एक उम्र के बाद सबको ब्रह्मज्ञान (स्वयं ज्ञान या सृष्टि-ज्ञान ) हो जाता है. अत: शान्ति बनाए रक्खे. मैं ज्ञान के तलाश में हूँ…. इसके लिए मुझे किसी अन्य के मंतव्यों/वक्तव्यों (वेद गीता पवित्र कुराने-करीम) की जरुरत नहीं होगी. ऐसा मेरा विश्वास है.

हज़रत मुहम्मद (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया है कि…किसी भी मुसलमान के नज़दीक सबसे बड़ा गुनाह किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है…

अब ये बताने की जरुरत नहीं है की ठेस कब कब कैसे लगता है.

बेहतर होगा लेखक अपनी ऊर्जा राष्ट्र के नवनिर्माण में लगाएं, राष्ट्र आज बारूद के ढेर पे है. वेद कुरआन को तार्किक बहस का मुद्दा न बनाकर, राष्ट्र हित में चिंतन करें. अपने आस पास युवाओं में वैश्विक और तकनिकी शिक्षा का प्रसार करें. केवल संस्कृति, तहजीब और उचित मानवीय व्यवहार एवं चारित्रिक गुणों को पुष्ट करने के लिए “वेद, कुरआन आदि” का सन्दर्भ लेना श्रेयष्कर रहेगा. न की यह कहना की यही सही है और अंतिम है.

शुभ भाव



Note: CYBER LAW IS ACTIVE IN INDIA. SO BE CAREFULL.

लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई

भारतीय स्वाधीनता दिवस १५-अगस्त. यह १५ अगस्त हर साल आता है. और हम सभी देशवासी गर्व से स्वंतंत्रता दिवस मनाते हैं. साथ ही बंटवारे की त्रासद घटना को भी याद करते हैं. किसी शायर (अभी नाम याद नहीं) की यह पंक्तिया “लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई” भारतीय इतिहास के इसी क्षण की बात कहता है. ये वो समय था जब बापू (महात्मा गांधी) अविभाजित भारत के सभी राजनीतिज्ञों के श्रधेय थे, गुरु थे. कांग्रेस पार्टी स्वाधीनता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाली सबसे बड़ी पार्टी के सदस्यों, देश के नीति निर्माणकर्ताओं और अन्य संघर्षशील समूहों के सामने कुछ प्रश्न बेचैनी बढ़ा रहे थे. बापू अब कैसे क्या किया जाना है?

द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रस्ताव पर फैसला होना था. हुआ भी, एक ख़ास धर्म और अल्पसंख्यकों के आजादी व कल्याण के विचारणार्थ(और किसी के स्वार्थपूर्ति) हेतु भारतीय उपमहाद्वीप पर “पाकिस्तान” नाम का भूखंड इस्लामिक मुल्क के मुहर के साथ अस्तित्व में आया और दूसरा शेष भारत जहाँ संप्रभुता के लिए “धर्म-निरपेक्षता” की कवायद पूरी हुई. विभाजन रेखा के आस पास और कुछ दूर दराज के इलाके के बाशिंदे (आम जन जो बाद में मुहाजिर शरणार्थी या कुछ और कहलाए) सोचते रह गए, उनके सपनो का आज़ाद देश कौन सा है. इधर से उधर और उधर से इधर या जो जहाँ रुकना चाहे रुक सकता है. बस यहीं पर लम्हों ने खता कर दी.

फिर भी मैं इस भूल को सबसे बड़ी भूल नहीं कह सकता. यदि गांधी, गांधीवादी और सेक्युलर समर्थकों ने धर्म निरपेक्षता की बात कही तो इसमें गलत क्या है. हर लोकतांत्रिक देश के नागरिक ऐसी ही व्यवस्था पसंद करेंगे. वैसे भी जिस देश में अतिथि देवो: भव:, सर्व धर्म समभाव की परंपरा रही है वहां एक धर्मावलम्बी बहुसंख्यकों की आस्था को सम्मान देते हुए एक तरफ़ा संविधान बनाना उचित नहीं था.

ख़ता तो सिर्फ इतनी हुई की प्रथम प्रधानमंत्री और प्रथम गृह मंत्री (उप-प्रधानमंत्री) नाम में अदल बदल हो गया. एक तरफ राष्ट्र का साहसी सेवक सरदार पटेल खड़े थे दूसरी तरफ विदेशी मेहमानों का सेवक नवाब नेहरु खड़े थे. एक तरफ अखंड भारत का सपना संजोये वीर और कूटनीति में माहिर लौह पुरुष सरदार पटेल खड़े थे तो दूसरी तरफ महाज्ञानी विश्व्यापी अंग्रेजी कालीन पर निवास करने के शौक़ीन हम बच्चो के चाचा नेहरु खड़े थे. गांधी जी धर्म संकट में थे. मुखिया किसे बनाया जाये, चाहते तो बापू अपने किसी बेटे को सत्ता की दौर में आगे रख सकते थे. लेकिन बापू तो सच्चे महात्मा थे उनके किसी बेटों में उन्हें सच्चे नेता की झलक न मिली, उनके नजदीकी में भी ऐसा कोई नहीं था जो इतने बड़े मुल्क की रहनुमाई कर सके. और जब सामने दो कर्मठ युग पुरुष जिन्ना और नेहरु मोर्चे पर खड़े हों तो किसी तीसरे को तभी सोचा जाये जब उसमे भी कुछ असाधारण बात हो. कुछ समय पूर्व से ही जब नेहरु परिवार बापू की व्यक्तिगत सेवा में जी जान से जुटा था. विशेषरूप से इंदिरा जी में गांधी जी को अनंत संभावनाए दिखती थी वह इस लिए की पिता के साथ रह कर इंदिरा ने भी बापू और देश की सेवा की थी. बापू अक्सर नेहरु से कहा करते थे अपनी बिटिया को राजनीति के ज्ञान देना.

आखिर वो कौन सी मजबूरी थी जो सदैव राष्ट्र हित में चिंतन करने वाले महात्मा को नेहरु के आगे झुकना पड़ा.

इंदिरा जो की माँ कमला की मृत्यु के बाद १९३६ से ही कांग्रेस में सक्रीय हो चुकी थी. उन्होंने वानर सेना का सफल नेत्रित्व भी किया था. अपने पिता की नज़र में एक गलती कर बैठी वो ये की अपने पत्रकार मित्र फीरोज़ खान से शादी की हठ करने लगी. फ़िरोज़ जिनके पिता जूनागढ़ के नवाब खान और माता एक पारसी महिला थी, नेहरु के सामने समस्या – ये शादी कैसे स्वीकार करे. मामला गांधी जे समक्ष रखा गया. बापू ने कहा इसमें कौनसी समस्या है, उसने फीरोज़ से मिलकर उसका नाम धर्म परिवर्तन करवा दिया “फीरोज़ गांधी”. वे नेहरु से बोले लो ये मेरा बेटा हो गया अब तो तुम अपनी बेटी की शादी इससे कर सकते हो. नेहरु जी ने कहा अब कोई दिक्कत नहीं है बापू.

व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति के लिए ये कैसी ख़ता हो गयी. जब वीर सरदार पटेल के हाथ में स्वर्ण भारत का भविष्य सौपना था वहां शासन एक ऐसे नवाबी परिवार के हाथ में आ गया, जो अब तक की सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी भी इसी परिवार के गुलाम बन कर रह गए. त्रासदी यही है की आज कोई भी कांग्रेसी नेता कितना भी बड़ा राष्ट्रवादी, ज्ञानी और सेक्युलर क्यूँ न हो सत्ता की बागडौर इस राज परिवार (गांधी ब्रांडेड नेहरु परिवार) से अपने  हाथ में नहीं ले सकता.

हिंदी ब्लॉगजगत में कोई गुटबाजी नहीं है…

जैसे पूरा हिन्दुस्तान विभिन्न कला-संस्कृति, बोल-चाल, रहन-सहन के आधार पर बंटा हुआ है. उसी प्रकार यह समूचा ब्लॉग-जगत भी है. मेरा अनुभव यही कहता है की यहाँ कोई
गुटबाजी नहीं है. ऐसा कुछ दिखना एक स्वाभाविक परिणति है. तेजी से बढती हुई ब्लोगेरों की भीड़ को हम एक जगह बांधकर नहीं रख सकते. कुछ बातें हिंदी ब्लॉगजगत के लिए संतोषजनक है जैसे, हिंदी में अधिकाधिक ब्लोगरों द्वारा नित्य हिंदी लेखन (काव्य, हास्य, व्यंग्य, ज्ञानवर्धक आलेख, यात्रा वृत्तांत, परिचर्चा या अन्य किसी भी विधा में हो) हो रहा है, हिंदी वेब टूल्स एवं सॉफ्टवेर अनुप्रयोगों का दिनोदिन विकास और विस्तार, विभिन्न राज्यों और देश विदेश में बैठे हिंदी-प्रेमियों के बीच बनता सामजिक और सरस  सम्बन्ध.

दुःख होता है जब कहीं किसी ब्लॉग पर सनसनी, गैरजरूरी मुद्दे और विवाद को बढाने वाली पोस्टे बहुतायत में सबका ध्यान खींचती रहती है. ये सब T.R.P. का मामला लग रहा है. हमलोग पहले से ही टेलीविजन मीडिया वाले से परेशान हो चुके थे ‘वे T.R.P. और नंबर 1 की दौड़ में कुछ भी पडोसने लग गए है.’ अब ब्लॉग जगत में भी कुछ स्थलों पर ऐसा  कुछ कुछ होने लगा है.

कुछ ब्लोगरो की पोस्ट इसलिए भी ज्यादा  पढ़ी जाती है की वे नेट पर ज्यादा सक्रिय हैं और अधिक समय व्यतीत करते हैं. इसमें किसी को आश्चर्य करने की कोई जरुरत नहीं है. अधिकाँश ब्लोगर स्वाभाविक हिट्स और सहज प्रतिक्रया प्राप्त कर आत्ममुग्धता के शिकार हो रहे हैं यह भी एक कारण है जरुरी बहस सम्पूर्ण नहीं हो पाती. यहाँ लेखक ही सम्पादक और प्रकाशक है इसकी जिम्मेदारी बहुत कम ब्लोगर समझते हैं. अपने लिए नए पाठक ढूंढने के बजाय कुछ ब्लोगर(प्रकाशक) अपनी पोस्ट पर टिपण्णी देने के लिए निरंतर आग्रह ईमेल करते हैं यह जानते हुए भी की सभी की अपनी पसंद अलग है और ब्लॉग लिखने, पढने और कमेन्ट के लिए सबके पास समय भी एक सामान नहीं है. ईमेल फीड की सुविधा सभी ब्लॉग पर पहले से ही उपलब्ध होती है. सुधि पाठक इसका लाभ उठाते हैं. इसलिए यह सोचना गलत है की मेरे छापे को पाठक नहीं पढ़ते हैं.

यहाँ विचार सम्प्रेषण के बहुत सारे माध्यम टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ऑडियो, विडियो, साक्ष्य में पहले से उपलब्ध दस्तावेज, वेब कड़िया आदि होने के बावजूद भी समय का अभाव है. पाठक भी कम समय में ज्यादा से ज्यादा चीज़े बटोरना चाहते हैं. इन सब गहमा गहमी में नए ब्लोगर परेशान हो जाते हैं. कभी कभी तो मुझे लगता है जो एग्ग्रीगेटर ब्लॉग पोस्टो को पाठक से मिलवाने का एक उत्तम कार्य प्रतिदिन, प्रतिक्षण निष्पादन करती है, उन्ही के कुछ टूल्स दिग्भ्रमित भी करते है. जैसे ब्लोगवाणी पसंद चटका टूल, चिट्ठाजगत सक्रियता क्रमांक टूल,  फ़ोलोवर्स की फेहरिश्त(including thumb view picture), हिट्स और कमेंट्स काउंटर इत्यादि. इन सबने मिलकर ब्लोगर की विविधता और मौलिक प्रस्तुति पर नियमन सा लगा दिया है. फलस्वरूप नए उत्साही लेखक/ब्लोगर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो रहे हैं. कहीं कहीं पुराने सक्रिय ब्लोगरों पर गुटबाजी का आरोप लगाते हैं. कुछ ब्लोगर अपनी सहज मौलिक सोच को सीधे सीधे प्रस्तुत करने से स्वयं को रोकते हैं. जबकि ब्लोगिंग लेखन के लिए सबसे आज़ाद जगह है. यहाँ प्रस्तुतीकरण का कोई नियम नहीं है. हाँ असामाजिक और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कोई पसंद नहीं करता. इन्टरनेट के यूजर्स/पाठक जागरूक हैं वे फ़ौरन सबक सिखा देते हैं. ब्लोगिंग कोई खेल नहीं है यह समझना होगा.